Tuesday, 14 August 2018

दोसर बरखक मधुश्रावणी

"दोसर बरखक मधुश्रावणी"
(अहि छवि के देखैत जे किछु कल्पना में आयल से लिखी रहल छी)

          की कहै छी सखि ई सौन(सावन) जे ना कराबय.. हमत'  लाजे मरि गेलहुँ आ संगे, मोने-मोन हँसियो छुटैत रहल.
काल्हि तार बाबू हिनकर चिट्ठी द'गेल छलाह...
हुनक चिट्ठी देखी सौस पुछलैथ...कनिया किनकर छी चिट्ठी...की सब लिखल अहि चिट्ठी में...आब की कहितीयन्ह...कही देलियन्ह, हिनके बेटा के छैन्ह, मुदा की बताबियन्ह,कि ओहि में की लिखल छैन्ह.... कहलियन्ह
"हिनका याद करै छैन्ह...प्रणाम लिखलकैन्ह"
अहि के किछु काल उपरांत फोन बाज' लागल...
बुरही से चुप रहल नै भेलैन्ह.."ऐं ये कनिया...एत्तेक राति भेल,फोन के करैया...जो... बुझितो नहि छै कियो, जे राति सूत' लेल होइ छै..." मोने त' हम्मर खोंझायल...निनो(नींद) ते ने आबै छै हिनका...भरि दिन कान लगौनेहिये रहै छथि..कहलियन्ह_ई सुति ने रहैथ, कथि लेल जागल छैथ?" मुदा चैन कहाँ हुनका...."ऐं ये कहलों नहि, केकर फोन अछि,अत्ति राति?"नहि मानती...सबटा बूझिये के रहती ई बुरही...
आब फेर स' की बतबियन्ह...बुरही के एखने त' सांत केने रही...की कहिये जे हिनके बेटाक फोन छैन्ह,की कहती.... किछ काल पहिनहिये  चिट्ठी वला बात कहि निबटेने रहियन्ह...
कहलियन्ह..."हिनके बेटाक फोन छलैन्ह,कहलखिन्ह_ माय के देखला कत्तेक दिन भ' गेल से काल्हि गाम आबै छी..."
"धुरजो एखने त' किछे दिन गेना भेलैया..."
ननैद रानी सबटा देखी सुनी रहल छलैथ..हँसियो आबि रहल छलैन्ह...
अप्पन माय पर तमसाईत बजलीह...एँगै बुढ़िया भौजी से की की पुछ' लागै छीहिं..!बुझै नैं छीहिं काल्हि मधुश्रावणी छीयै...."
अपर्णा झा

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