Friday, 17 August 2018

जिज्ञासा मात्र

"जिज्ञासा मात्र"
कहाँ तो हिंदी के संवादों को पढ़ते सुनते ऐसा लगता था कि हिंदी भाषा की मिठास,ओज,समन्वयता और उसमें व्याप्त सहिष्णुता सब कुछ समय के साथ ह्रास होते जा रहा है...परन्तु,इन दो दिनों से लगातार टीवी चैनलों को सुनते  लगा कि मैं गलत सोच रही थी.हिंदी भाषा में जो संवाद है,शब्दों में जो संस्कार है और जो मिठास व्याप्त है,वह अभी भी बाँकी है,बस विषयों का चुनाव थोड़ा गलत हो रहा है.आज जब महानुभावों को टीवी पर अपने अनुभवों को साझा करते सुना,जहाँ हर कोई वायपेयी जी की प्रशंसा करते हुए थक नहीं रहे थे....क्या पक्ष,क्या विपक्ष, क्या पत्रकार और...ऐसे में एक आम जनता तो यही सोचेगी कि काशकि जब देश के चुनाव की बारी आती है तो राजनीति और समाज दोनो ही स्तर पर आपस में गाली-गलौज और चरित्र हरण कर नागरिकों को गुमराह क्यों करते हैं,क्यों उन्हें सत्ता की कुर्सी का लोभ सताता है! क्यों यही लोग भूल जाते हैं कि पार्टी से ऊपर देश/तंत्र सर्वोपरि है.
आज क्यों वाजपेयी जी के जाते ही लोगों में यह सोच उमड़ आई है कि उन्हें प्रधानमंत्री इतने कम अवधि के लिये ही क्यों बनाया गया..यदि वाजपेयी जी और एपीजे सत्ता के सर्वोच्च पद पर कुछ लंबे समय तक आसीन होते तो क्या भारत जैसी भूमि और हिंदी भाषा विश्व पटल पर प्रगति और स्वाभिमान का दूसरा नाम होता.
कुमार विश्वास के शब्दों से मेरी सहमति है कि " भारतीय राजनीति इस विषय को ले इतिहास के पन्नों पर खुद को सदैव दोषी मानेंगी."
क्या आज इन दो दिनों में हम और हमारा समाज कुछ आत्म मंथन और आकलन कर पायेगी...क्या देश के भविष्य निर्माण में वाजपेयी जी का जीवन सहायक सिद्ध होगी?
अपर्णा झा

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