Tuesday, 28 August 2018

शरारत जो भुलाई ना गई(संस्मरण)

"मातृभाषा का असर"
(शरारत जो कभी भुलाई ना गई)

बात उन दिनों की जब मैं स्नातकोत्तर में थी.
जे एन यू क्लास करने जाती थी. मेरी बड़ी बहन का छोटा सा बेटा 'अनुज' भी हमारे साथ ही  रहता था. उसकी सारी जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर थी. वह जिस स्कूल में पढ़ता था  वह मेरे यूनिवर्सिटी से थोड़ी और दूरी पर था और बीच मे था दिल्ली का आई आई टी संस्थान. यहां से उसके स्कूल तक जाने के लिए बस बदलनी होती थी.
            माँ का दिल्ली के बसों में  चढ़ने का तजुर्बा नहीं था. अनुज चूंकि prep-class l में पढ़ता होगा ,कई बार ऐसा भी होता था कि स्कूल की छुट्टी से घर वापसी के दौरान उसे बस में नींद आ जाती तो स्कूल बस वापिस उसे स्कूल छोड़ देता. मेरी नियमित ड्यूटी में दोपहर को मां से पब्लिक बूथ से फ़ोन कर बच्चे का हाल पूछना शामिल था. यदि वह घर पहुंचा तो ठीक, नहीं तो उसे स्कूल से लाने जाती. इसके अलावा उसके PTM में भी मुझे ही जाना होता. अनुज मुझे कभी भी सलवार कमीज में अपने स्कूल जाने नहीं देता, इसलिए मुझे जीन्स में ही जाना होता था.
    एक बार की बात है जब मैं अपने जीन्स और खादी के कुर्ते में उसके PTM में जा रही थी.जैसा कि मैंने कहा रास्ते में IIT के बस स्टॉप से बस बदल कर चढ़ी तो मेरे साथ  चार विद्यार्थी उस संस्थान से भी चढ़े, जिनमें से एक को सीट भी मिल गई. मैं भी उसी सीट के सामने खड़ी थी. बस चलने लगी और उनके बातों का सिलसिला भी. चारों अपनी मातृभाषा 'मैथिली' में बात कर रहे थे.चूंकि मैं भी मैथिल ठहरी तो उनकी बातों पर मेरे भी कान खड़े हो गए. मुझे देख वो आपस में चुटकियाँ ले रहे थे.तभी मेरे बगल में खड़े विद्यार्थी ने मैथिली में कहा_ "देखो हम लोग इस तरह बोल रहे हैं कहीं ऐसा ना हो, ये सब समझ रही हो ". तभी सीट पर बैठे विद्यार्थी ने बड़ी बहादुरी से कहा_"नहीं ऐसा हो नहीं सकता.अगर ऐसा हुआ तो मैं अपनी सीट से उठ जाऊंगा. " मुझे भी हंसी आ गई. मैंने मुस्कुराते हुए कहा _तखन तs अपने उठिए जौ ...."(तब तो आप उठ ही जाइये).
बाँकि तीनों विद्यार्थी किसी तरह हंसी रोके रहे और सीट पर जो बैठे थे वो एकदम से हतप्रभ हो उठ खड़े हुए.उन्हें हंसी भी आ रही थी और थोड़ा शरमाये हुए भी ...
बस में आसपास वाले सोच में पड़े कि आखिर यहां हो क्या रहा. तभी मैं ने उन विद्यार्थियों की चुप्पी तोड़ते हुए कहा..."आप लोगों को मज़ा आया या नहीं मुझे पता नहीं पर मुझे बहुत मजा आया .शैतानी जो आपलोगों को सूझी वो आपने की और मुझे भी जो सही लगा वो मैंने की. शायद और कोई होता तो मैं चुप रह जाती.पर ,शायद ये हमारी मातृभाषा का असर हो जो मैं अपनी अभिव्यक्ति को रोक ना सकी. आप लोगों से परिचय होना, कि आप यहां MTech के विद्यार्थी हैं बहुत अच्छा लगा और गौरवान्वित  भी हुई.अच्छा तो मैं चलूं ,मेरा स्टॉप आ चुका है."
ये वो शरारत थी जिसे मैं ना आज तक भूल पाई और शायद मुझसे कभी भुलाई ना जा सके .
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना

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