नीरू जी जो कि विदेश में रहतीं हैं और भारत,अपने शहर शिमला जाने का जब भी अवसर मिलता है,वो जी जाना चाहतीं हैं उन सारे लम्हों को,उन सारे रिश्तों को,उन सारी वाकीफ़ियत को जो कि देश के ज़र्रे-ज़र्रे में वाबस्ता है.हालांकि उनके लिये देश और विदेश का अंतर बस इतना ही है कि कृष्ण के लिये जिस प्रकार से मथुरा जन्मभूमि और द्वारका कर्मभूमि रही पर प्रेम तो उसकी भूमि से रही जो कि कहीं की हो...मौसम बेशक बदल जाएं धरा जो कि माँ कही जाती है वो अपनी प्रकृति कहाँ बदलती!यही हाल हमारी सखि का भी...
आज उनकी छवि उस लाल पत्रपेटी के सँग मुखपोथी पर देखी और कुछ अपने यादगार लम्हों को भी उन्होंने साझा किया ...तो मुझे भी अपना बचपन याद हो चला...दादाजी का वो जोर जोर से खुशी से चिल्ला उठना कि फलाँ की माँ,तुम्हारे बेटे का विवाह तय कर दिया.लड़की को पढ़ना-लिखना भी आता है.वह पत्र लिख लेती है.
...और दादी हमारी खुश की बहू उनके लिये धार्मिक ग्रंथ पढ़ देगी, घर में कोई तो होगा जो जिसे अक्षर ज्ञान पढ़ने और लिखने दोनो में होगा.
मुझे याद आता है कि जब हमने पढना-लिखना सीखा था तो उसकी दो उपयोगिता नज़र आईं...
पढ़ने से तातपर्य यह रहा कि पत्रिकाओं को पढ़ने हेतु अब सहारा नहीं लेना होगा और दूसरा यह कि सिनेमा का नाम और हॉल का पता अखबारों से अपने से ही कर लेते.वो एक समय था जब सिनेमा देखना परिवार में किसी उत्सव से कम नहीं जान पड़ता...
लिखने की लालसा इस लिये जागृत हुई कि बाबूजी-माँ को अपने माता-पिता को चिट्ठी लिखते देखती और उनकी खुशियों को उनके मुखमंडल पर देखा जा सकता था.और कई दिनों के इन्तिज़ार के बाद जब वो अंतर्देशीय,पोस्ट कार्ड या लिफाफा उनके नाम से जवाब में आता तो उनकी खुशी देखते बनती थी.कई घंटों के लिये पत्रों के मजमून गप्पबाज़ी का विषय बन जाते थे.
हमें भी अपने बाबा की रिश्तेदारी बहुत पसंद थी और चाहते थे कि बाबा हमारे नाम से भी चिट्ठी लिखें...बस बाबूजी से जिद्द कर बैठते कि हमें बाबा को पत्र लिखना है.हमारी लिखावट में बाबूजी हमारे स्तर की भावनात्मक बातें लिखवा देते.कुछ दिन तक पत्र लेखन ऐसा ही रहा.फिर कुछ बातों पर बाबुजी से इत्तिफ़ाक़ ना रखने पर, अपने भावों को बाबूजी की बताते और फिर बाबूजी उन्हें शब्दों का रूप दे देते और ऐसे करते -करते खुद ही पत्र लिखना आ गया.अपनी तो जो खुशी हुई सो हुई परन्तु उस खयशी चार्म बिंदु यह रहा कि बाबा को लोगों से कहते सुना कि पोती उनकी चिट्ठी भी लिखने लगी.लगाकि स्कूली कक्षा में प्रथम स्थान पा उत्तीर्ण हुई.
अब पत्र लेखन का उत्साह तो थोड़ा बहुत कम हुआ,अब ये था कि पत्र लिखनाय है,लिफाफा या अंतर्देशीय में डालकर उसपर पता के सन बाएं किनारे पर अपना नाम लिखना फिर उसे चिपकाना और तत्पश्चात उसे पटरपेटी में गिराना था.हमारे घर के सामने वाली पटरपेटी का मुंह थोड़ा ऊंचा था तो बाबुजी के गॉड में चढ़ कर टैब पत्र को उस पेटी में गिराया करते थे.
डाकिया का उस पेटी के ताला को खोल पत्र निकालना देख,कितना आनन्दप्रद लगता था कि अब तो अमुक व्यक्ति को मेरा पत्र प्राप्त हो ही जायेगा.
आज जब इस आभासी दुनिया में हमने कडसम रखा है जहां मोबाइल, इंटरनेट की सुविधा ही संवाद का जरिया बन गई, मुझे लगता है जितने सुखतम अवधि में हमारा संवाद हो जाता है, शायद रिश्तों की बुनियाद भी उतनी ही सिकुड़ती जा रही है.एक पत्र के पीछे जीवन के कितने ही भाव समाहित रहते थे.खुशियां,सहिष्णुता,तप, जुड़ाव और शिक्षा सभी तो इससे बंधे होते थे.
मध्य युगीन भारत और स्वतंत्रतापूर्व एवं उसके बाद भारत की स्थिति और विशेष कर महिलाओं की स्थिति काफी डियनेरी और सोचनीय थी.समाज को विकास पथ पर ले जाने हेतु स्त्री शिक्षा पर महत्व देना आवश्यक हुआ.पुरुषे वर्ग अब खेतीबाड़ी से ऊपर उठ शहरों की तरफ जाने लगे.परन्तु परिवार का ढाँचा ग्रामीण ही रहा.ऐसे संवाद का एकमात्र माध्यम पत्र ही तो था.पत्नी या माँ को ऐसे घरेलू कार्यों के अलावा बाहर जाकर नौकरी करने वालों को हमेशा वस्तु-स्थिति से अवगत कराने की भूमिका पत्रों ने ही निभाई.मुझे लगता हैकि शिक्षित भारत और विकसित भारत की प्रगति में यदि लोग शिक्षित हुए तो इसके पहले पड़ाव में पत्र संवाद की भूमिका को कम नही आंका जा सकता...
आज भी वो पत्र लेखन,लाल पत्र पेटी, डाकिया और डाकिया का पत्र लेकर आने की समय सीमा...सभी रोमांचित कर जाती है.यह पत्र-पेटी संवाद का माध्यम ही नही बल्कि ढेरों भावनाओ से भरा पिटारा था,जिसमें बाबा-पोती के प्यार,भाई-बहन की राखी,नए वर्ष की शुभकामनाएं,बेटे-बेटी के विवाह की खुशखबरी,नौकरी और पढ़ाई में उत्तीर्ण होने की खुशखबरी और कुछ शो संतप्त संदेश भी...किसके हिस्से क्या आना है वह तो लिफाफा खुलने और पढ़ने के पश्चात ही पता चलता था...
फिर भी हम चाहे कितना भी कुछ कह लें,खुद को दिलासा दें कि प्रगति के राह पर जो कुछ आता और जाता है वह बेहतरी के लिये होता है,पर इस बात से इनकार भी नहीं कि पत्र जिसका कि चाहे हक़ीकी दुनिया से वास्ता हो,वो चाहे इतिहास की बातें हों या फसाना हो,साहित्य हो या चलचित्र में बेशक कुछ अवधि का दृश्य हो...मन को सुखकर तो लगता ही है...पत्र यानि शब्दों को जीती मेरी सखा सहेली जो युगों से कहती आ रही है तुम्हें शिक्षित होना है,तुम्हें दुनिया देखनी है और तुम्हे खुद के विश्वास को,खुद सशक्त बनाना है.चिट्ठी पत्रपेटी चाहे कितना भी रूप बदल लें लेकिन जब तक जीवन है,संसार है तब तक तुम्हारा अस्तित्व है और रहेगा, तुम्हारे अस्तित्व को कोई मिटा नहीं सकता.
अपर्णा झा.
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