Tuesday, 14 August 2018

खतरनाक कौन :बुद्धिजीवी या नेता या कोई और...

सवाल यह कि समाज के लिये खतरनाक कौन....आतंकवादी या बुद्धिजीवी?
यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब बस समय ही देता है.
वर्तमान हमेशा ही शिकायतों से भरा होता है,भूतकाल को पकड़ने की कोशिश होती है,पर आजतक कोई पकड़ नहीं पाया.भविष्य को देखा नहीं जा सकता. हर हाल में इंसानी फितरत है वो दुखी रहेगा ही. जो वर्तमान को जी गया, उसके लिये भूत और भविष्य की कोई अहमियत नहीं होती....
जिसे हम आतंकवादी कहते हैं वह वर्तमान में सबसे अधिक खुश रहने वाला व्यक्ति है.क्योंकि उसके जीवन में जीने के लिये लक्ष्य है.शायद वह अपने समूह/देशभक्ति को जी रहा है.(*इतिहास को पलट कर देखें तो आतंकवादी की व्याख्या मिल जाएगी.आतंकवादी एक ही समय में अपनी मातृभूमि के लिये देशभक्त होता है तो दूसरी ओर इसके विपरीत वह अपने लक्ष्य को पाने हेतु आतंक फैलाता है उस भू भाग के लोगों/समाज के लिये वो आतंकवादी है.क्योंकि वो अपने लक्ष्य को पाने हेतु डराने-धमकाने से लेकर खून खराबा और संपत्ति के विनाश तक को अंजाम दे सकता है और इसके पीछे उस भूभाग के  लोगों में अराजकता फैला कर वहाँ की सरकारों पर राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक,मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखना चाहता है.)उसे मरने जीने का डर नहीं.
यदि बुद्धिजीवी की बात करें तो जो वास्तव में बुद्धिजीवी हैं वो तो परिभाषाओं से ऊपर उठ चुके हैं.
याद रखिये आतंकवादी और वही बुद्धिजीवी खतरनाक होते हैं जिन्हें जीवन से कोई लोभ हो...व्यभिचारी हो और शरारती हो.ऐसी हालत में दोनों ही प्रकार के लोग खतरनाक होंगे और महात्वाकांक्षा उससे कुछ भी करा सकती है.
इससे अलग एक समाज का एक और वर्ग है.एक ही पद पर नौकरी में दो तरह के लोग,वेतन भी एक ही जैसा,एक महल का सुख भोगता है और एक को झोंपड़ी भी नसीब नहीं होती...और मज़े की बात यह कि वो ना तो आतंकवादी है और नाहि बुद्धिजीवी...
ऐसे लोगों को किस श्रेणी में रखा जाय?आज ये तीनों स्थितियां मिलकर हमारे देश को तो खोखला कर ही रही परन्तु अब यह एक देश की नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समस्या बन समाज को घुन के मानिंद खाये जा रही है और इस समस्या का निदान ढूंढना आज के हालात में तो असम्भव सा जान पड़ रहा है...अंतरराष्ट्रीय पटल पर अनेकों बैठक,सेमिनार,कॉन्फ्रेंस इस का हल ढूंढने हेतु लगातार प्रयासरत हैं.जबतक कोई हल नहीं मिलता,तबतक प्रश्नवाचक पर ही दिमाग पर ज़ोर देते रहना है,इस आस में कि कहीं से शायद कोई हल मिल जाय.
अपर्णा झा

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