मेरी भगवती मेरे घर टिकती ही नहीं.
विवाह पूर्व कभी भगवान के लिये समय नहीं,बस दौड़ भाग की जिंदगी.विवाह के पश्चात में बिल्कुल खाली हो गई.आहिस्ते-आहिस्ते पूजा पाठ करना अच्छा लगने लगा.सावन की सोमवारी और नवरात्र पूजा आहार से निराहार और फिर अखंड ज्योति...परन्तु घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं और देखने में यह आया कि 365 के 360 दिन मुझे बेशक कुछ भी ना करना पड़े पर नवरात्र या पूजापाठ के दौरान कुछ ना कुछ जाचना आहि जाती.मैं अपने अधूरे कार्यों को देख चिरचिड़ि ना हो जाऊं,मन को माना लिया कि शायद मेरे इस गार्हस्थ्य जीवन औचित्य कुछ और हो, अपनी जमाई सारी बातों को धीरे-धीरे काम करती गई,भगवान को शायद यही मंजूर हो.दूसरी तरफ़ अपनी मां को देखती हूँ कि वो घंटों अपने ध्यान में मग्न है, अब उसका गार्हस्थ्य जीवन की जिम्मेदारी पूर्णता ले चुकी है.
माँ शायद इसी को कहते हों...
अपर्णा झा
Tuesday, 28 August 2018
माँ
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