Saturday, 18 August 2018

रिश्ता अछूत का

"रिश्ता अछूत का"
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(पहले के ग्रामीण परिवेश में
जातिय व्यवस्था की तारतम्यता जिसे
मैंने भी अपनी आँखों से देखा है और अनुभव किया
और अब लिख रही हूँ.)

                  साल 1980-81 का रहा होगा ,ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो. तीन महीने की सर्दियो की छुट्टी में मैं परिवार संग कश्मीर से गाँव जा रही थी. रात के अँधेरे में जब गाँव पहुँची, किसी को जानती भी नहीं , तब बहुत छोटी थी मैं. उस समय में दरभंगा से अपने गाँव तक पहुँचने का एकमात्र साधन बस हुआ करता था. और यही नहीं वहाँ से अपने आँगन तक पहुचने के लिए कम से कम ढाई-तीन km पैदल चलना पड़ता था. पर बस से उतरने वाले राहगीर अनजान होते हुए भी इतना घुल-मिल चुके होते थे मानों एक काफिला बना लिया हो . लंबे रास्तों की थकावट का पता ही ना लगता. शहर बसने वाले हम जैसे लोगोँ के लिए ये बेशक अद्भुत अनुभव हो मगर उस रास्ते पर चलने वालों की तो मानों रोज की वाकफियत थी.
                मिलने-जुलने का सिलसिला रास्ते तक ही नहीं रहता बल्कि  रात के अंधियारे में भी घर पहुंचने पर भी कायम रहता. समाज के हर वर्ग के आशना हमसे मिलने आते थे. इस बार जब  जब गांव आई,रात नींद में बीती, सुबह ने अपनी रफ़्तार सूर्योदय से पहले ही पकड़ ली थी. दालान से तानपुरे पर रामधुन, आँगन से सीता-राम की सुर लहरियाँ, कहीं तुलसी चौरा को मिट्टी का लेप लगातीं बहु-बेटियां और फिर लालटेन और पीढ़ा(पाटा) को रोज की तरह साफ़ करती माएं.
तभी नाई का आना, मालिन का पूजा के लिए पान-फूल दे जाना, बहुओं के नित्य क्रिया और किचन के जरुरत के मुताबिक पानी कुँए या दूर के किसी नल से लाने के लिए पनिहारन , खेत में काम करने वाला धानुक का हाजिरी बजाना_हर कोई अपने गुजरे कल की कहानी के साथ उपस्थित होते और यहीं से शुरू हो जाता हंसी-ख़ुशी के माहौल में दैनिक कार्यों का सिलसिला. जीवन में एक अद्भुत तारतम्यता, इन सबके बीच मैं वर्णव्यवस्था को बड़ी सटीकता से पालन होते देख पा रही थी. उच्च वर्गीय व्यवस्था के अंदर आने वाले हर जाति के लोगों का  पालनहार बनना और पालनहार के प्रति विश्वासपात्र होने की जिम्मेदारी को मैं भली-भांति देख पा रही थी.
             इन सब के बीच एक व्यवस्था 'खबास' या 'संवदिया' का था .ये आमतौर पर स्त्री हुआ करती थीं और आगँन का जरुरी सन्देश दूसरो तक पहुंचाने का काम करती थीं. ऐसी महिलाएं मुझे काफी रोचक लगीं. होता यूँ था कि पर्दा प्रथा के अंतर्गत जब बहुएं घर के अन्य स्त्रियों से पर्दा करती थीं तो यही संवदिया या खबास इनके लिए एक सखा या मातृ रूप में  सुख-दुःख की सहभागी होती थी. घर के अंदर और बाहर का हाल जितना घर के सदस्यों को पता ना हो, इन्हें हर बात की जानकारी होती और इसलिए यह कहा जा सकता है की लोक लाज एवं सामाजिक दबाव बनाने में समाज में इनकी एक अहम भूमिका थी.
               आज लोग भौतिकतावाद के चपेट में खुद को जातीय संघर्षो में उलझा चुके हैँ. मैंने देखा है कि जो लोग गाँव में संयुक्त परिवार की सेवा पुश्त दर पुश्त करते आ रहे हैं वो उस परिवार का वह लोग हिस्सा होते थे और यही नहीं ,जब ऐसे लोग शहर आते थे तो हमारे घरों में ही रुकते और माँ उनके रहने ,खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम करती थीं और प्रयास यह होता कि ये लोग घर से नाराज होकर ना जाएं. माँ जब भी गाँव जातीं तो तोहफे के तौर पर जो कुछ भी घर के सदस्यों के लिए ले जातीं ,उसमें एक हिस्सा इनका भी होता.
                       ये कैसा रिश्ता था जो ना खून का होते हुए भी जिसमें एक ऐसा जुड़ाव कि मिलन की ख़ुशी और बिछुड़ने की पीड़ा को हर कोई महसूस कर रहा होता था. क्या कहा जाय ऐसे लुप्तप्राय प्रेम के बंधन को जिसे किसी दीवार या डोर में बाँधने की जरुरत 'वक्त' ने भी महसूस नही किया था.हां एक रिश्ता अछूत का जिसे बंधनो की आवश्यकता नहीं थी.
@Ajha.04.07.16

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