Saturday, 28 July 2018

देश कहाँ, धर्म कहाँ

"देश कहाँ और धर्म कहाँ....!"

समझ में नहीं आता कि खुद को परिभाषित करूँ या वर्तमान को...
हम दूषित हुए हैं या समय हमें दूषित कर रहा!
यह सब क्या...मोबलिन्चिंग तो गाय-भैंस हत्या या फिर हिन्दू आतंकवाद और मुसलमान आतंकवाद...
क्या देश की प्रगति,सर्वधर्मसमभाव और वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति को भूल चुका है.मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति प्रेम जिसे कवि कोकिल विद्यापति ने कहा:
"देसिल बयना सब जन मिट्ठा..."
अर्थात : "अपने देश या अपनी भाषा सबको मीठी लगती है।"
क्या हम भूल चुके उस अमीर खुसरो को जिन्होंने हमारे देश को गंगा-जमुनी तहजीब दी.जरा सोचिये तो एक ऐसा इंसान जिसका पिता तुर्की और माँ हिन्दू जिन्हें मुसलमान आक्रांताओं के हुकूमत ने मुसलमान बना दिया.जिस दौर में कदम कदम पर धर्मांतरण की धमकी मिलती हो, जहां उसे अपने गुरु से मिलने पर पहरा हो...मुसलमान सुल्तानों के अलग अलग दरबार में मंत्री भी हो,फनकार भी हो और फौज में सिपहसालार भी हो.जिसने स्त्रियों के दर्द को समझा,जिसने बेटी के बाप होने के दर्द को समझ(बाबुल ना ब्याहो विदेश...),जिसने हिन्दू रानी के इज़्ज़त को सम्मान दिया था(पद्मावत की गाथा जहां अलाउद्दीन खिलजी को खुसरो ने पद्मावत को जीतने की मनाही की थी),मैं सोचती हूँ वो कैसा वतनपरस्त इंसान होगा.कैसा होगा वो इंसान जिसकी कविताएं हिंदी में झूमती थी,उत्सवों का एहसास कराती थीं.उसे हिंदुस्तानी के सांवले रंग पर घमंड था.खुसरो कहा करते थे कि उन्हें हिदुस्तान के रंग-रंग में मुहब्बत का खयाल आता था.खुसरो ने यह कैसे लिखा होगा  कि  "मुसलमानों का खयाल है कि मौत के बाद उन्हें जन्नत नसीब होती है, इसलिये जीवन उनकेलिय एक 'कैदखाना' है लेकिन हिन्दोस्तान में जो ठंडी हवाएं चलतीं है वही इस देश को जन्नत बनाती है और इस कारण यहां बसने वाले आक्रांता इसे क़ैदख़ाने की बजाय बहिश्त(जन्नत) कहते हैं.
आज जहां धर्म और वर्ग संकीर्णता की पराकाष्ठा है वहीं अमीर खुसरो ने लिखा कि यहां का मौसम अमीर-गरीब सभी को रास आता है...जहाँ किसान एक पुरानी चादर में ठंडी रात गुज़ार लेता है वहीँ ब्राह्मण रात्रि के अंतिम प्रहार में जमुना नदी के किनारे ठंडे पानी की डुबकी लगा लेता है.
इतने भाषाओं और जीवन के विभिन्न विधाओं के धनी भारतीय दर्शन की तारीफ़ करते और संस्कृत को फ़ारसी से बड़ा मानते.पक्षियों की भाषा समझने वाले खुसरो भारतीय पक्षियों के लिये कहते हैं कि ये तो इंसानों की तरह बोली बोलते हैं, जहाँ कौवे भविष्य की बातें करते हैं वहीं गौरैये गुप्त बातों का पता बतातीं हैं....
हैरानी होती है  मध्यकालीन भारतीय देश में भी नागरिक इतना धर्मनिर्पेक्ष हुआ करते थे!!!
इस देश ने तो सदैव जीवन का अपना एक सिद्धांत जिया है, समय,समय पर आक्रांताओं के आक्रमण से खुद को मजबूत और संस्कृति को धनी किया है तो फिर,आज हम अपने सामाजिक प्रगति को वैश्वीकरण के शिखर पर होते हुए भी प हमारे सोचने की शक्ति भला इतनी कमज़ोर कैसे हो गई है. इतने शिक्षित होकर भी हमारे सारे तर्क एक एक कर धराशाई क्यों हो रहे हैं...क्या किसी सभ्यता का अंत अपनों से और विनाशकाले विपरीत बुद्धि से ही होता है...और यदि यही सच है तो क्या हम उस विनाश के पथ पर अपना कदम बढ़ा चुके हैं????
अपर्णा झा

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