Saturday, 28 July 2018

साहित्य दोहन

आज आदरणीय Gangesh Gunjan जी का पोस्ट 'यश विलास' से प्रेरित हो मेरे जो उद्गार लेखनी के माध्य्म से आये उसे यहां साझा करती हूं:
यथार्थ ही लिखा है आपने.जब मैंने अपनी लेखनी थामी थी तो लगता था कि मैं क्या लिख रही हूं?फिर थोड़ी सी हिम्मत आयी और लिखना शुरू कर दिया.साहित्यिक समूहों में अपने पोस्ट साझा करने लगी.ज्यादा नहीं  2-3 ही महीने हुए थे कि मुझे साझा संकलन में अपनी रचना प्रकाशित करने हेतु न्योता भी आया.मेरे लिये यह एक ऐसी खुशी का मौका था कि घर में किसी की सलाह पर अमल करना ही नहीं था.ख़ैर,2500 रुपए खर्चे और साझा संकलन भी आ गया.आज 4 साल हो गए... 10 प्रति में में किसी को भी बांट नहीं पाई सिवाय बाबूजी के. क्या बांटती भला!!! एक तो लिखना नही आता था, दूसरे कि दो-तीन किताबों में रचनाएँ प्रकाशित करने पश्चात यह समझ में आया कि आपकी रचना का सम्पादन करना तो दूर की बात यदि साइज लंबी हुई तो ऐसे कैंची लगता है कि रचना...तौबा तौबा...
इतना ही नहीं अब तो बात यह भी समझ में आ गई कि आप एक *समूह से साल भर के प्रकाशन हेतु कुछ 5-10 हज़ार की राशि जमा करें और ऐसे में आपको सालभर साझा संकलनों में तो आपकी रचना प्रकाशित होगी ही और साथ में इतने सारे शॉल, प्रशस्ति पत्र और साहित्य सम्मानों की झड़ी लग जायेगी कि आप भी खुद में आश्चर्य करेंगे.खैर,जिन्हें दुकान चलाना है वो चलाएं.परन्तु ऐसे में साहित्य सम्मान पाने वाले लोग 'तगमा खरीदना' या फिर 'आज तेरी कल मेरी' के सिद्धांतों पर चलने वाले क्या कभी खुद से  बात करते होंगे कि वाकई में वो इसके काबिल थे  भी या नहीं?
माफ़ कीजियेगा,आज के समय जितनी गुणवत्ता साहित्य के क्षेत्र में मौजूद है वह शायद ही कभी हो परन्तु इस खरीद-फरोख्त के दौर में असली काबिलियत कहीं खो सी जाती है...
ऐसे में मुखपोथी का timeline मुझे सबसे उचित स्थान दीख पड़ता है जहां आप खुद को व्यक्त कर पाते हैं.
मैं नहीं जानती कि मेरी बातों से कितने लोग संतुष्ट होंगे.पर हाँ मैंने खुद के लिये घाटे का काम किया है कि मैं अपनी रचनाओं को थोड़े से धनराशि देकर छपवाऊँ और सम्मान प्राप्त करूँ. मेरे लिये मेरा 'timeline और कुछलोग' यही संतुष्टि देती है.
अपर्णा झा
*मेरा कथन हर समूह हेतु लागू नहीं होता.

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