Tuesday, 4 December 2018

"बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी......"

"बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी......"
          
      आज हम जितना तटस्थ हो कर अपनी बातें रख पा रहे हैं मुझे नहीं लगता कि आज से पहले कोई  इतना खुल कर अपनी भावों को प्रेषित कर सकता. शायद संवाद का आज से पहले इतना आसान जरिया भी नही था , अधिकाँश लोग इतने जागरूक भी नहीं थे, और दूसरों की कही सुनी पर आसानी से विश्वास भी कर जाते थे. परन्तु आज
शायद यही जागृति की अवस्था मुझे अपनी बातें कहने को मजबूर करतीं हैं. कल क्या होगा ,यह इस बात पर निर्भर करता है कि आज हमने कैसा कदम उठाया है और मैं इसे ही मानती हूँ. समय और परिवेश हमेशा बदलते रहते हैं .जरुरी नहीं जो हम आज सोच कर चल रहे हों ,परिणाम वैसा ही निकले. हो सकता है सोच से ज्यादा अच्छा भी परिणाम हो और बुरा भी.
              राजनीति से पहले भी मुझे कोई मोह नहीं था  और आज भी सत्ता मुझे सीधे या उलटे तौर पर लाभान्वित नहीं कर रही. चाहती तो विद्यार्थी जीवन में राजनीति की ओर कदम बढ़ा लेती. उस समय तो चुनाव में जाने के लिए पैसों की आवश्यकता भी नहीं होती थी.आज  जितनी परेशानियां किसी को है उतनी मुझे भी है . परन्तु कोई भी अच्छा कदम उठाये तो उसकी सराहना भी होनी चाहिये ,चाहे वह किसी भी पक्ष का क्यों ना हो और उसे सही तौर पर कार्यान्वयन में प्रोत्साहन भी मिलनी चाहिए.
         हां , मैं मानती हूँ सोशल मीडिया के आने से हर आम ओ खास आदमी को अपनी बातें जनमानस के पटल पर रखना आसान हो गया है और इसे मैं शुभ संकेत मानती हूँ. एक समय था जब आम जनता राजनीतिक , सामाजिक,आर्थिक गतिविधियों को पत्रकारिता के माध्यम से सुनते और समझते थे. वो समय भी ऐसा की जो हस्तियां संसद में जाती वो भी एहतराम पसन्द और ज़हीन होते और संसद की गरिमा बनाये रखना अपना उत्तरदायित्व समझते. पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों में भी एक गरिमा बनाये रखने का एहसास था. इन कारणों से आम जनता में पहुंचने वाले संवाद अव्वल तोबहुत दूर तक पहुंच भी नहीं पाती पर जो पहुंचती तो लोग उसे सच मान बैठते क्यों की आम लोगों को अपने नेता पर विश्वास होता था. दुसरा कारण यह भी कि ज़मींदारी प्रथा और अशिक्षा के कारण आवाज़ उठाने की उनमें हिम्मत नहीं होती. आज सोशल मीडिया के आने से अब हर आम ओ खास अपनी बातें लोगों के मानस पटल पर रख पाता है.आज लोग इतने मुखर होकर या प्रखर होकर इस कारण अपनी बातों को रख पाते की उन्हें अपने नेता और इसी प्रकार के  महकमों पर से विश्वास उठ गया है, उन्हें अपनी बात रखने को मंच मिला है.आज उनकी बातें कारगर साबित दीख रही.आज अपने नेता को सीधी तौर पर संसद से सड़क तक देख पा रहे , समझ पा रहे. आज सोशल मीडिया के कारण लोग जो जागृत अवस्था में आये हैं , उसका विश्व पटल पर सीधा प्रभाव दीख पद रहा. पत्रकारों के आंकलन गलत हों जाएं ,मोदीजी का चुनाव जीतना, अमेरिका जैसे देश में उलट परिणाम हो जाना एवं पाकिस्तान में बलूच,सिंधियों का विरोध के स्वर गूंजना ,इसे हम क्या कहेंगे
          सहिष्णुता एवं असहिष्णुता की जहां तक बात है ,बस समय का इंतज़ार है. मैं मानती हूँ की आगामी चुनाव में यदि सत्ता पक्ष जीतती है तो यह जनता के सोच की जीत होगी और अगर हार होगी तो यह भी आम लोगों के सोच की हार होगी . ना इससे नेताओं का कुछ जाना है और ना ही मलाई वर्ग  का कुछ होगा.

         शायद कुछ  उम्मीद सी बंधी है और जिसे साकार होते देखना चाहती हूँ. ऊंट किस ओर करवट लेता है बस यही देखना है.आजतक दुनियां में  जितनी भी क्रांतियाँ हुई हैं वह मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग के जागृत होने पर ही हुई है . बस आशावादी और पूरे तौर से खुद को तटस्थ मानती हूँ.
          राजनीति ,विभिन्न दलगत कैसे काम करते हैं और सरकार कैसे काम करती हैं और क्या क्या उनकी परेशानियां होती हैं इस सब बातों को अच्छे से समझती भी हूँ.अपनी बातों को खुले तौर पर अभिव्यक्त करने को कत्तई सहनशीलता का ह्रास ना माना जाय. यह हमारे और आपके विचारों को उजागर करती हैं और इस तरह लोगों के मत को जानना आसान होता है और यही सही जनमत के आकलन का सूचक भी.
@Ajha.05.12.16

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