Friday, 14 August 2015

राष्ट्रवाद

बचपन में किस्से-कहानियाँ जो सुनी थी ,
उन्हीं बातों को, सवालातों को
बड़े होने तक लिये चली थी .
अब मैं आजाद हूँ ,
अपने सोच की परवाज़ हूँ .
बस यही सोच के साम्यवाद अपनाया था ,
मार्क्स को अपना खुदा बनाया था .
जवानी में मार्क्सवाद का नशा ,
इतना सर चढ़ कर बोलेगा _
समाज बदलने की ताकत ,
खयालात बदलने की ताकत ,
मंदिर, मस्जिद, अट्टालिकाओं को
ढाहने की ताकत ,
एक समदृष्टि बनाने की ताकत
दिवास्वप्न में आने लगे  .
नींद खुली तो पाया ,
हमने ही तो साम्यवाद में
घुन लगाया .
बस अब समझ में इतना आया_
" वाद " कोई भी बुरा नहीं होता ,
ये तो परिस्थितियाँ हैं,  जो
इंसानों से समाजों में बन जाती हैं .
गरीबी में " साम्यवाद " ,
अमीरी में " साम्राज्यवाद
और बाजारवाद " ,
सोया रहा तो नित गुलामी ,
जग गया तो " क्रांति " पक्की .

Photo taken from net . 

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